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Friday, September 8, 2017

माँ दुर्गा मंत्र एवं स्तुति

इस नवरात्री इन दुर्गा माँ के मंत्र  और स्तुति का पाठ करें , अत्यंत फलकारी होगा 

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Durga Mantra

“Sarva Mangala Mangalye Sive Sarvartha Sadhike
Saranye Trayambike Gauri Narayani Namostute”

In Sanskrit:

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥




Devi Stuti

“Ya devi sarva bhuteshu, shanti rupena sangsthita
Ya devi sarva bhuteshu, shakti rupena sangsthita
Ya devi sarva bhuteshu, matri rupena sangsthita
Yaa devi sarva bhuteshu, buddhi rupena sangsthita
Namastasyai, namastasyai, namastasyai, namo namaha’‘

In Sanskrit:

या देवी सर्वभुतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता ।
या देवी सर्वभुतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
या देवी सर्वभुतेषु मातृरूपेण संस्थिता । 
या देवी सर्वभुतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता । 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

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Benefit from Chanting of above mantra : This mantra is recited almost during all rituals, celebrations and events. Regular chanting can give wisdom , strength and prosperous life. Above mantra and shlok helps build inner power and allows him to develop healthy, loving relationships. Chanting of this Mantra blocks negative thoughts and banish ignorance.

हे देवी, आप मंगला, काली, भद्र काली, कपालीनी, दुर्गा ,क्षमा , शिवा, धात्री , स्वाहा, स्वधा के नाम से जाना जाता है, मैं आपसे प्रार्थना करता हूं। हे देवी, मुझे अच्छे भाग्य, अच्छे स्वास्थ्य, अच्छे दिखने, सफलता और प्रसिद्धि के साथ आशीर्वाद दें। ओह वैष्णवी, आप दुनिया के लिए बहुत आधार हैं आपने विश्व को मंत्रमुग्ध किया है जब आप किसी से प्रसन्न होते हैं तो आप जीवन और मृत्यु के चक्र से अपना उद्धार सुनिश्चित करते हैं।

जय माता दी | जय माता दी | जय माता दी | जय माता दी | जय माता दी | जय माता दी | जय माता दी

Tuesday, April 9, 2013

Argala Stotram - Durga Saptsati (अर्गलास्त्रोतम)


अर्गलास्त्रोतम   Argala Stotram





मार्कण्डेय उवाच


नमश्वण्डिकायै



जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी


दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते  





जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि


जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते  


मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ३॥

महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ४॥

धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ५॥

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ६॥

निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रिलोक्यशुभदे नमः
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ७॥

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ८॥

अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ९॥

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि १०॥

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ११॥

चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि १२॥

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम्
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि १३॥

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम्
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि १४॥

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि १५॥

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि १६॥

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि १७॥

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पनिषूदिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि १८॥

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि १९॥

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंसुते परमेश्वरि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि २०॥

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि २१॥

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि २२॥

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि २३॥

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि २४॥

भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि २५॥

तारिणि दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि २६॥

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः
सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम् २७॥


इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे अर्गलास्तोत्रं समाप्तम्